Words

Choking down with the words today,
Shall I say or quiet be I may…

Unable to voice it all out,
Or, afraid of being heard wrong…

Looking upon the sky for response,
Oh! my stars, where are you today…?

Oh! dear wind!
be my messenger…
talk to the stars,
and, carry my stories…

Let me exhale all my words,
You be my friend, in all the odds…

 

– Priya Soni

 

Image credits: Pinterest

 

 

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Almost

Holding a pen,
I drew him,  almost…
Nebulous memories
led me numb,
Distinguishing him from the two shadows,
From the image which was once one…

Holding those thoughts,
I fell for him,  almost…

Talking to the torn pages,
They still hold his touch…
Looking at the sky,
I felt his stare,  almost…

Smiling all the way though,
I missed him,  almost…

– Priya Soni

Image source: nairaland.com

 

via Daily Prompt: Almost
Almost

अंतर्द्वंद

अंतर्द्वंद,
या उपापोह विचारों का
संयुक्त पर बिखरे से उन सवालों का,
जवाब जिनके खोजना चाहती हूँ,
अंतर्मन को टटोलना चाहती हूँ,
या किसी पुस्तक को ही खगोलना चाहती हूँ,
जहाँ विस्तृत वर्णन हो,
न केवल जवाबों का,
पर सवालों का भी

घर की इस खिड़की से देखती हूँ,
बाहर यही एक वृक्ष है
डाल से जुड़े कुछ पत्ते हैं,
जो चाहे जितना हवा के झोंके से लेहरालें,
पर वृक्ष से दूर जाने की उन्हें इज़ाज़त नहीं होती
यही से ही पल भर को,
देखते हैं गगन में उड़ते हुए,
उन पंछियों को,
कुछ ईर्ष्या से भरे मन को लिए,
अपनी इस विवशता से झुंझला से जाते हैं

कुछ ही देर में दिन ढलने को हुआ,
आसमान में एक लालिमा सी छा गयी,
वृक्ष भी जैसे उस वक़्त सुनहरा हो गया,
और पत्ते, की जैसे मोती चमक रहे हों

तभी पंछियों का जोड़ा भी अपने घोंसले में लौटा,
उदास मन से पत्तों ने पूछा,
“तुम्हे नहीं कोई विवशता,
लौट कर यहाँ आने की,
फिर क्यों नहीं उड़ जाते,
दूर कहीं फिर उसी गगन में”
पंछी इस बात को सुन मुस्काये,
जीवन में स्थिरता के महत् को समझाए,
“लुभावना है जो दूर से गगन,
नहीं है वहां घर सा वो सुकून,
यहीं इस वृक्ष से नाता है हमारा ,
तुम्हारे ही साथ बचपन पला है हमारा”
इस बात को सुन पत्ते भी मुस्काये,
एक मृग-तृष्णा से निकलकर, वो खिलखिलाये
और वृक्ष,
तो जैसे तृप्त हो आया,
अपने एक अभिन्न परिवार को था उसने पाया

ये अंतर्द्वंद,
या उपापोह विचारों का
संयुक्त पर बिखरे से उन सवालों का,
जवाब जिनके छुपे हैं,
इसी वृक्ष रुपी अंतर्मन में,
निकलकर स्वप्न रुपी मृग-तृष्णा से,
खोजती हूँ जवाब,
जीवन के आलिंगन में ||

_ Priya Soni

Image Source: google.com