Verse

ये समां कुछ है धुंधला

या गर्द-ऐ-नज़र का है सिला

हमें ज़माना नापाक लगा

न्हें हम दाग़-दार लगे  

 

– प्रिया सोनी

 

Verse

आज फिर खुद पे,
कुछ नवाज़िशें कर लें
इन उजालों को हटा,
चांदनी का सकून लें
एक तनहा सफर की
जो कहानियाँ दब सी गयी हैं,
आसमां से लिपट कर,
आज खुद से इकरार कर लें

 

– प्रिया सोनी

रंगभूमि

सही और गलत धर्म निरपेक्ष हैं,
पर हर किसी के लिए अलग हैं

एक सोच का समंदर है,
एक अनुभव की पतवार
निर्णय गर हो जो आगे बढ़ने का,
तो संग है उलटी बहती धार

मुसाफिर का सफर है,
मांझी पर है दारोमदार
दोनों ही को स्वामी होने का है गुमान,
पर दोनों की रंगभूमि अलग है

आसान नहीं किसी की मनोस्थिति आंकना,
सबकी वास्तविकता अलग है
सही और गलत धर्म निरपेक्ष हैं,
पर हर किसी के लिए अलग हैं ।

– प्रिया सोनी

Verse

कुछ पल जो याद रह गयें,
उन्हें संवारने का जी करता है,
गुज़र चुका है जो वक़्त,
उसे अब जीने का जी करता है ।

 
– प्रिया सोनी

माँ

शाम हो चली है,
अब मुझे संभलना होगा,
कंकर जो मिले कहीं,
घुँघरू बना थिरकना होगा

खुद से ही जो मै हारने लगूं,
तो मेरी माँ का हौसला है साथ,
कठिन पथ से लौट के मै जा न सकूँ,
गर मेरी माँ का जज़्बा है साथ ।

आज यूँ परेशान हो माँ तुम,
कठिनाईओं से माना ग्रस्त हो तुम,
मुरझाकर मै हँसी हूँ सदा,
सतत तुम्हे देख कर,
आज तुम भी मुस्कुरा दो माँ,
मुझे खुद में देख कर ।

– प्रिया सोनी