Verse

हैरां हो क्यों जो अँधेरा है गर
खुश हूँ की चांदनी है डगर

 

 

– प्रिया सोनी

Verse

आज फिर खुद पे,
कुछ नवाज़िशें कर लें
इन उजालों को हटा,
चांदनी का सकून लें
एक तनहा सफर की
जो कहानियाँ दब सी गयी हैं,
आसमां से लिपट कर,
आज खुद से इकरार कर लें

 

– प्रिया सोनी

Verse

कुछ पल जो याद रह गयें,
उन्हें संवारने का जी करता है,
गुज़र चुका है जो वक़्त,
उसे अब जीने का जी करता है ।

 
– प्रिया सोनी

माँ

शाम हो चली है,
अब मुझे संभलना होगा,
कंकर जो मिले कहीं,
घुँघरू बना थिरकना होगा

खुद से ही जो मै हारने लगूं,
तो मेरी माँ का हौसला है साथ,
कठिन पथ से लौट के मै जा न सकूँ,
गर मेरी माँ का जज़्बा है साथ ।

आज यूँ परेशान हो माँ तुम,
कठिनाईओं से माना ग्रस्त हो तुम,
मुरझाकर मै हँसी हूँ सदा,
सतत तुम्हे देख कर,
आज तुम भी मुस्कुरा दो माँ,
मुझे खुद में देख कर ।

– प्रिया सोनी

Verse: Her

इक लौ जल रही थी,
इक आग बनके बहकी

इक चाह जो छुपी थी,
इक अर्ज़ बनके निकली

इक याद आज लौटी,
इक शब्द बनके चहकी

आसमां से लिपट कर,
इक रात जब वो रोई,
घनी निशा जो लगती थी वो,
अब होने लगी सुरमयी

इक आस अब है बाकी,
इक राह उसने ताकी,
तारों के संग वो गाती
दुनिया से है वो बागी ।

Priya Soni